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5 जून/पुण्य तिथि परमपूज्य श्री गुरु जी

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5 जून/पुण्य तिथि परमपूज्य श्री गुरु जी परमपूज्य श्री गुरु जी का जन्म फाल्गुन मास की एकादशी संवत् 1963 तदनुसार 19 फ़रवरी 1906 को महाराष्ट्र के रामटेक में हुआ था। वे अपने माता-पिता की चौथी संतान थे। उनके पिता का नाम श्री सदाशिव राव उपाख्य 'भाऊ जी' तथा माता का श्रीमती लक्ष्मीबाई उपाख्य 'ताई' था। उनका बचपन में नाम माधव रखा गया पर परिवार में वे मधु के नाम से ही पुकारे जाते थे। पिता सदाशिव राव प्रारम्भ में डाक-तार विभाग में कार्यरत थे परन्तु बाद में उनकी नियुक्ति शिक्षा विभाग में 1908 में अध्यापक पद पर हो गयी। मधु जब मात्र दो वर्ष के थे तभी से उनकी शिक्षा प्रारम्भ हो गयी थी। पिताश्री भाऊजी जो भी उन्हें पढ़ाते थे उसे वे सहज ही इसे कंठस्थ कर लेते थे। बालक मधु में कुशाग्र बुद्धि, ज्ञान की लालसा, असामान्य स्मरण शक्ति जैसे गुणों का समुच्चय बचपन से ही विकसित हो रहा था। सन् 1919 में उन्होंने 'हाई स्कूल की प्रवेश परीक्षा' में विशेष योग्यता दिखाकर छात्रवृत्ति प्राप्त की। सन् 1922 में 16 वर्ष की आयु में माधव ने मैट्रिक की परीक्षा चाँदा (अब चन्द्रपुर) के 'जुबली हाई स्कूल...

खटिया

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#कमर दर्द , सरवाइकल और चारपाई. #हमारे पूर्वज वैज्ञानिक थे। सोने के लिए खाट हमारे पूर्वजों की सर्वोत्तम खोज है। हमारे पूर्वजों को क्या लकड़ी को चीरना नहीं जानते थे ? वे भी लकड़ी चीरकर उसकी पट्टियाँ बनाकर डबल बेड बना सकते थे। डबल बेड बनाना कोई रॉकेट सायंस नहीं है। लकड़ी की पट्टियों में कीलें ही ठोंकनी होती हैं। चारपाई भी भले कोई सायंस नहीं है , लेकिन एक समझदारी है कि कैसे शरीर को अधिक आराम मिल सके। चारपाई बनाना एक कला है। उसे रस्सी से बुनना पड़ता है और उसमें दिमाग और श्रम लगता है। जब हम सोते हैं , तब सिर और पांव के मुकाबले पेट को अधिक खून की जरूरत होती है ; क्योंकि रात हो या दोपहर में लोग अक्सर खाने के बाद ही सोते हैं। पेट को पाचनक्रिया के लिए अधिक खून की जरूरत होती है। इसलिए सोते समय चारपाई की जोली ही इस स्वास्थ का लाभ पहुंचा सकती है। दुनिया में जितनी भी आरामकुर्सियां देख लें , सभी में चारपाई की तरह जोली बनाई जाती है। बच्चों का पुराना पालना सिर्फ कपडे की जोली का था , लकडी का सपाट बनाकर उसे भी बिगाड़ दिया गया है। चारपाई पर सोने से कमर और पीठ का दर्द का दर्द कभी नही होता है। दर्द होने पर चारपा...

*ततिव्यूह वामवृत:-*

*ततिव्यूह वामवृत:-*      बायां पैर जमीन पर आते समय आज्ञा मिलेगी । सभी स्वयंसेवक दाहिने पैर आगे बढ़ाकर रुध लेंगे। *1. अग्रेसर का काम*:- १. दाहिने पैर का रुध लेना। २. बायां पैर वामवृत कर बायीं ओर रखना। दाहिना पैर बाएं पैर के आगे रखना। ३. बायां पैर बायीं ओर 75 सें .मी. बाजू में रखना। ४. दाहिना पैर बाएं पैर से मिलाना (दाहिने पैर का बाएं पैर के पास मितकाल) ( *रुध,बायें,आगे,बाजू,मित*) *2. विषम क्रमांक का काम*:- १. दाहिने पैर का रुध लेना। २. बायां पैर वामवृत कर बायीं ओर रखना।  ३.दाहिना पैर बाएं पैर के आगे रखना। ४. बायां पैर दाहिने पैर से मिलाते हुए  दो मितकाल करना। ( *रुध,बायें,आगे ,मित,मित*) *3. सम क्रमांक का काम*:- १. दाहिने पैर का रुध लेना। २. बायां पैर वामवृत कर बायीं ओर रखना। दाहिना पैर बाएं पैर के आगे रखना।  ३. बायां पैर बायीं  ओर 75 सें .मी. बाजू में रखना। ४. दाहिना पैर उठाकर बाएं पैर के आगे रखना। ( *रुध,बायें,आगे,बाजू,आगे*) *4. आगे आने वाले का काम*(अच्छन्न प्रतति में ):- १. दाहिने पैर का रुध लेना। २. बायां पैर वामवृत कर बायीं ओर रखना। दाहिना पैर बाएं ...

वामदिक प्रचलनम चतुर्व्यूह :-*

*वामदिक प्रचलनम चतुर्व्यूह :-* बाया पैर जमीन पर आते समय आज्ञा मिलेगी। सभी स्वयंसेवक दाहिना पैर आगे बढ़ाकर रुध लेंगे । *1.*अग्रेसर  का काम*:-  १. दाहिने पैर का रुध लेना। २. बाएं पैर से दाहिने पैर के पास मितकाल करना (बाएं पैर से दाहिने पैर को मिलाना) ३. दाहिना पैर दाहिनी ओर 75 सें.मी. बाजू में रखना। ४. बाया पैर 75 सें.मी.दाहिने पैर के आगे रखना । ५.दाहिना पैर बाएं पैर के आगे रखना। ६. बायां पैर वामवृत कर बायीं ओर रखना। ( *रूध, मित्,बाजू, आगे, आगे,बायें*) *2.*विषम क्रमांक का काम*:-  १. दाहिने पैर का रुध लेना। २. बायें पैर से दाहिने पैर के पास दो मितकाल करना। ३. बाया पैर आगे रखना। ४. दाहिना पैर आगे रखना। ४. बायां पैर वामवृत कर बायीं ओर रखना। ( *रुध,मित,मित,आगे,आगे,बायें*) *3.*सम क्रमांक का काम*:- १. दाहिने पैर का रुध लेना। २. बाया पैर उठाकर वही अपने स्थान पर पीछे की ओर रखना। ३. दाहिना पैर बाएं पैर से मिलाते हुए दायीं और 75 सें.मी. बाजू में रखना। ४. बायां पैर उठाकर दाएं पैर के आगे रखना।  ५. दाहिना पैर उठाकर बायें पैर के आगे रखना। ६.बायां पैर वामव्रत कर बायीं और रखना। ( *रुध...

*दक्षिणदिक प्रचलनम चतुर्व्यूह :-

*दक्षिणदिक प्रचलनम चतुर्व्यूह :-* बाया पैर जमीन पर आते समय आज्ञा मिलेगी। सभी स्वयंसेवक दाहिना पैर आगे बढ़ाकर रुध लेंगे । *1.*अग्रेसर  का काम*:-  १. दाहिने पैर का रुध लेना। २. बाएं पैर से दाहिने पैर के पास मितकाल करना (बाएं पैर से दाहिने पैर को मिलाना) ३. दाहिना पैर दाहिनी ओर 75 सें.मी. बाजू में रखना। ४. बाया पैर 75 सें.मी. आगे रखकर दाहिना पैर दक्षिण वृत कर दायीं ओर रखना। ( *रूध, मित्,बाजू, आगे, दाएं*) *2.*विषम क्रमांक का काम*:-  १. दाहिने पैर का रुध लेना। २. बायें पैर से दाहिने पैर के पास दो मितकाल करना। ३. बाया पैर आगे रखना। ४. दाहिना पैर दक्षिणवृत कर दायीं ओर रखना। ( *रुध,मित,मित,आगे,दायें*) *3.*सम क्रमांक का काम*:- १. दाहिने पैर का रुध लेना। २. बाया पैर उठाकर वही अपने स्थान पर पीछे की ओर रखना। ३. दाहिना पैर बाएं पैर से मिलाते हुए दायीं और 75 सें.मी. बाजू में रखना। ४. बायां पैर उठाकर दाएं पैर के आगे रखना और दाहिना पैर दक्षिण व्रत कर दायीं और रखना। ( *रुध,पीछे,बाजू,आगे,दायें*) *4.*पीछे जाने वाले का काम* (अच्छन्न प्रतति में):- १. दाहिने पैर का रुध लेना। २. बाया पैर उठाकर ...