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सबसे बड़ी सेवा कौन-सी है?

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सबसे बड़ी सेवा कौन-सी है? सबसे बड़ी सेवा वह मानी जाती है जिससे मानव जीवन, सम्मान और समाज का कल्याण होता हो। भारतीय संस्कृति में सेवा को बहुत ऊँचा स्थान दिया गया है। अलग-अलग दृष्टि से देखें तो ये सेवाएँ सर्वोपरि मानी जाती हैं— 1️⃣ मानव सेवा जरूरतमंद, गरीब, बीमार, बुजुर्ग या असहाय व्यक्ति की मदद करना। कहा भी गया है — 👉 “नर सेवा ही नारायण सेवा है।” अर्थात मानव की सेवा ही भगवान की सेवा है। 2️⃣ अन्नदान (भूखे को भोजन) शास्त्रों में अन्नदान को महादान कहा गया है, क्योंकि भोजन जीवन का आधार है। 3️⃣ शिक्षा सेवा किसी को ज्ञान देना या पढ़ाई में सहयोग करना। शिक्षा व्यक्ति का भविष्य बदल देती है। 4️⃣ गौ सेवा / पशु सेवा भारतीय परंपरा में गौ सेवा को पुण्य कार्य माना गया है, विशेषकर ग्रामीण जीवन में इसका विशेष महत्व है। 5️⃣ राष्ट्र सेवा देश, समाज और पर्यावरण की रक्षा व उन्नति के लिए कार्य करना भी महान सेवा है। 🌿 निष्कर्ष: सबसे बड़ी सेवा वही है जो निस्वार्थ भाव से, बिना किसी स्वार्थ या दिखावे के की जाए और जिससे किसी का जीवन बेहतर बने। 🌼 सबसे बड़ी सेवा 🌼 आदरणीय उपस्थित सज्जनों, गु...

अमरकंटक के बारे में जानकारी

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🌄 अमरकंटक के बारे में जानकारी अमरकंटक मध्यप्रदेश के अनूपपुर जिले में स्थित एक पवित्र और प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर तीर्थ स्थल है। इसे नर्मदा, सोन और जौहिला नदियों का उद्गम स्थल माना जाता है। यह विंध्य और सतपुड़ा पर्वत श्रेणियों के संगम पर बसा हुआ है। 🌊 1. नदियों का उद्गम नर्मदा नदी का उद्गम यहीं से होता है। सोन नदी और जोहिला नदी भी अमरकंटक से ही निकलती हैं। नर्मदा को हिंदू धर्म में गंगा के समान पवित्र माना जाता है। 🛕 2. प्रमुख धार्मिक स्थल नर्मदा उद्गम मंदिर – नर्मदा माता का मुख्य मंदिर। कपिल धारा – सुंदर जलप्रपात, जहाँ नर्मदा का जल ऊँचाई से गिरता है। दूध धारा – दूध की धारा जैसा दिखने वाला झरना। कल्याण आश्रम – धार्मिक व आध्यात्मिक केंद्र। 🌳 3. प्राकृतिक सौंदर्य घने जंगल, पहाड़ और शुद्ध वातावरण। पास में मैकल पर्वत क्षेत्र स्थित है। यहाँ औषधीय पौधों की भी बहुतायत है। 🗺️ 4. कैसे पहुँचें? निकटतम रेलवे स्टेशन: पेंड्रा रोड (छत्तीसगढ़) निकटतम बड़ा शहर: जबलपुर / बिलासपुर सड़क मार्ग से मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ से अच्छी कनेक्टिवि...

RSS की स्थापना भारत की आजादी से पहले 1925 में हुई देश में हिन्दू तब भी थे

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RSS की स्थापना भारत की आजादी से पहले 1925 में हुई देश में हिन्दू तब भी थे लेकिन वो RSS के साथ नहीं, महात्मा गाँधी के साथ चले।इस साथ के बदले गाँधी ने हिंदुओं की जमीन काट कर मुसलमानों को दे दी, वो जमीन जो हज़ारों साल से हिंदुओं की थी।क्षणिक आवेश के बाद शांत हुआ देश का हिन्दू तब भी गोडसे के साथ नहीं गया, नेहरू के साथ गया। चार दशक बाद,1980 में भाजपा बनी लेकिन देश का हिन्दू तब भी भाजपा के साथ नही था, इंदिरा के साथ था, राजीव के साथ था। तब संसद भवन/ राष्ट्रपति भवन में रोजा इफ्तार  होता था,हिन्दू ने कोई ऐतराज नहीं किया।हिन्दू तो अपने घर में माता को चूनर चढ़ा कर खुश था। हज के लिए सब्सिडी दी जा रही थी, हिन्दू तब अमरनाथ वैष्णो देवी की यात्रा में आतंकियों की गोली खा कर भी खुश था।ट्रेनों में, पार्कों में, बसों में, सड़कों को घेर कर नमाज होती थी। बेचारा हिन्दू खुद को बचा के कच्ची पगडंडी से घर-ऑफिस निकल जाता था।  ( दिल्ली में CAA,NRC के विरोध में महीनों धरना चला, हिन्दू १५-२० किमी चक्कर लगाकर घर आफिस जाता था लेकिन फ्री के चक्कर में केजरीवाल को जिताया। भीषण  दंगों का दंश झेला पूरे देश मे व...

Tattva-vetta Paramhansa ji

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प्रयागराज भारत के सबसे पुराने शहरों में से एक है

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नमस्‍कार दोस्‍तो स्‍वागत है आपका इस ब्‍लाेग मे हम ले चलते है आपको प्रयागराज  जी हॉ हम बिलासपुर से सारनाथ एक्‍सप्रेस से सीधे निकल पडे है प्रयागराज, बिलासपुर से रात को सारनाथ एक्‍सप्रेस मे बैठे ओर सुबह होते ही पहुच गये प्रयागराज जहा पर हम स्‍टैशन से बाहर निकलते ही हमने आटो बुक किया जिसमे हमने वहा स्‍टेशन पर ही अपने पण्‍डा जी का पता पूछा पूछने पर कुछ गुमराह करने की स्थित समक्ष मे आई जिसके कारण एक समक्षदार व्‍यक्ति की आटो मे बैठकर सीधे घाट चलने के लिये बात किये ओर निकल पडे प्रयागराज घाट की ओर ।  यहा पर कुछ लोगो से अपने पण्‍डा श्री गोपाल जी पाठक का पता पूछा जेसे तेसे वो मिल गये फिर चाचा जी ने उनका नम्‍बर लेकर बात किये ओर बुलाया गया उनसे मिलकर बहुत अच्‍छा लगा उन्‍होने अपना पूर्ण सहयोग प्रदान करते हुये हमारी हर सम्‍भव मदद की एवं आंगे कभी भटकने की जरूरत नही पडेगी ऐसा आश्‍वासन प्राप्‍त हुआ ।  यहा पर पूजन एवं मुण्‍डन के पश्‍चात हम सभी संगम तट पर स्‍नान हेतु चल दिये । गोपाल जी पाठक ने नाई, एवं नौका बाले सभी का अच्‍छा इंतजाम कर दिये थे हम्‍हे भटकना नही पडा ।  जिले के बारे में प्...

guru poornima

गुरु पूर्णिमा  सनातन धर्म की संस्कृति है। डा0 श्री प्रकाश बरनवाल राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रबुद्ध सोसाइटी का कहना है कि परमेश्वर शिव दक्षिणामूर्ति रूप में समस्त ऋषि मुनियों को शिष्य के रूप शिवज्ञान प्रदान किया था। उनका स्मरण करते हुए गुरुपूर्णिमा मनायी जाती है। गुरु पूर्णिमा उन सभी आध्यात्मिक और अकादमिक गुरुजनों को समर्पित परम्परा है जिन्होंने  कर्म योग  आधारित व्यक्तित्व विकास और प्रबुद्ध करने, बहुत कम अथवा बिना किसी मौद्रिक खर्चे के अपनी बुद्धिमता को साझा करने के लिए तैयार हों। इसको भारत, नेपाल और भूटान में हिन्दू, जैन और बोद्ध धर्म के अनुयायी उत्सव के रूप में मनाते हैं। इस पर्व को  हिन्दू ,  बौद्ध  और  जैन  अपने आध्यात्मिक शिक्षकों / अधिनायकों के सम्मान और उन्हें अपनी कृतज्ञता दिखाने के रूप में मनाया जाता है। यह पर्व  हिन्दू पंचांग  के हिन्दू माह  आषाढ़  की पूर्णिमा (जून-जुलाई) मनाया जाता है। [5] [6]  इस उत्सव को  महात्मा गांधी  ने अपने आध्यात्मिक गुरु  श्रीमद राजचन्द्र  को सम्मान देने के लिए पुनर्जीवित कि...

स्‍वर विज्ञान स्‍वामी मुक्‍तानंद जी द्वारा

स्वामी शिवानंद सरस्वती स्वामी शिवानंद का जन्म 1887 में तमिलनाडु के पट्टामदई में हुआ था मलाया में एक चिकित्सा चिकित्सक के रूप में सेवारत, उसने अपना अभ्यास त्याग दिया, चला गया ऋषिकेश और स्वामी द्वारा 1924 में दशनामी संन्यास में दीक्षित किया गया था विश्वानंद सरस्वती। उन्होंने दौरा किया पूरे भारत में व्यापक रूप से, प्रेरक लोग योग का अभ्यास करें और नेतृत्व करें दिव्य जीवन। उन्होंने दिव्य जीवन की स्थापना की 1936 में ऋषिकेश में सोसायटी, 1945 में शिवानंद आयुर्वेदिक फार्मेसी, योग वेदांत वन 1948 में अकादमी और 1957 में शिवानंद नेत्र अस्पताल। के दौरान अपने जीवनकाल में स्वामी शिवानंद ने हजारों शिष्यों का मार्गदर्शन किया और दुनिया भर में उम्मीदवारों और 200 से अधिक पुस्तकों के लेखक। स्वामी सत्यानंद सरस्वती स्वामी सत्यानंद का जन्म अल्मोड़ा में हुआ था। उत्तर प्रदेश, 1923 में। 1943 में उनकी मुलाकात हुई ऋषिकेश में स्वामी शिवानंद और दशनामी सन्यास का मार्ग अपनाया जीवन का। 1955 में उन्होंने अपने गुरु के आश्रम को छोड़ दिया एक भटकते हुए भिखारी के रूप में रहने के लिए और बाद में अंतर्राष्ट्रीय योग की स्थापना की...

अमरनाथ गुफा का सच

✴️☀️अमरनाथ गुफा का सच☀️✴️ ~••~••~••~••~••~••~••~••~••~••~ #narayankavach    पैगंबर मोहम्मद का जब जन्म भी नहीं हुआ था, तब से अमरनाथ गुफा में हो रही है पूजा-अर्चना ! इसलिए इस झूठ को नकारीये कि अमरनाथ गुफा की खोज एक मुस्लिम ने की थी ! जानिए अमरनाथ का पूरा इतिहास ताकि आप भी अपने बच्चों को बता सकें..... बाबा बर्फानी के दर्शन के अमरनाथ यात्रा शुरू हो गयी है। अमरनाथ यात्रा शुरू होते ही फिर से सेक्युलरिज्म के झंडबदारों ने गलत इतिहास की व्याख्या शुरू कर दी है कि इस गुफा को 1850 में एक मुसलिम बूटा मलिक ने खोजा था! पिछले साल तो पत्रकारिता का गोयनका अवार्ड घोषित करने वाले इंडियन एक्सप्रेस ने एक लेख लिखकर इस झूठ को जोर-शोर से प्रचारित किया था। जबकि इतिहास में दर्ज है कि जब इसलाम इस धरती पर मौजूद भी नहीं था, यानी इसलाम पैगंबर मोहम्मद पर कुरान उतरना तो छोडि़ए, उनका जन्म भी नहीं हुआ था, तब से अमरनाथ की गुफा में सनातन संस्कृति के अनुयायी बाबा बर्फानी की पूजा-अर्चना कर रहे हैं। कश्मीर के इतिहास पर कल्हण की ‘राजतरंगिणी’ और नीलमत पुराण से सबसे अधिक प्रकाश पड़ता है। श्रीनगर से 141 किलोमीटर दूर 388...

कार्य व्यवस्था

सम्राट शांतनु ने विवाह किया एक मछवारे की पुत्री सत्यवती से।उनका बेटा ही राजा बने इसलिए भीष्म ने विवाह न करके,आजीवन संतानहीन रहने की भीष्म प्रतिज्ञा की। सत्यवती के बेटे बाद में क्षत्रिय बन गए, जिनके लिए भीष्म आजीवन अविवाहित रहे, क्या उनका शोषण होता होगा? महाभारत लिखने वाले वेद व्यास भी मछवारे थे, पर महर्षि बन गए, गुरुकुल चलाते थे वो। विदुर, जिन्हें महा पंडित कहा जाता है वो एक दासी के पुत्र थे, हस्तिनापुर के महामंत्री बने, उनकी लिखी हुई विदुर नीति, राजनीति का एक महाग्रन्थ है। भीम ने वनवासी हिडिम्बा से विवाह किया। श्रीकृष्ण दूध का व्यवसाय करने वालों के परिवार से थे,  उनके भाई बलराम खेती करते थे, हमेशा हल साथ रखते थे। यादव क्षत्रिय रहे हैं, कई प्रान्तों पर शासन किया और श्रीकृषण सबके पूजनीय हैं, गीता जैसा ग्रन्थ विश्व को दिया। राम के साथ वनवासी निषादराज गुरुकुल में पढ़ते थे। उनके पुत्र लव कुश महर्षि वाल्मीकि के गुरुकुल में पढ़े जो वनवासी थे तो ये हो गयी वैदिक काल की बात, स्पष्ट है कोई किसी का शोषण नहीं करता था,सबको शिक्षा का अधिकार था, कोई भी पद तक पहुंच सकता था अपनी योग्यता के अनुसार। वर...

शनि देव

श्मशान में जब महर्षि दधीचि के मांसपिंड का दाह संस्कार हो रहा था तो उनकी पत्नी अपने पति का वियोग सहन नहीं कर पायीं और पास में ही स्थित विशाल पीपल वृक्ष के कोटर में 3 वर्ष के बालक को रख स्वयम् चिता में बैठकर सती हो गयीं। इस प्रकार महर्षि दधीचि और उनकी पत्नी का बलिदान हो गया किन्तु पीपल के कोटर में रखा बालक भूख प्यास से तड़प तड़प कर चिल्लाने लगा।जब कोई वस्तु नहीं मिली तो कोटर में गिरे पीपल के गोदों(फल) को खाकर बड़ा होने लगा। कालान्तर में पीपल के पत्तों और फलों को खाकर बालक का जीवन येन केन प्रकारेण सुरक्षित रहा।   एक दिन देवर्षि नारद वहाँ से गुजरे। नारद ने पीपल के कोटर में बालक को देखकर उसका परिचय पूंछा- नारद- बालक तुम कौन हो ? बालक- यही तो मैं भी जानना चाहता हूँ । नारद- तुम्हारे जनक कौन हैं ? बालक- यही तो मैं जानना चाहता हूँ ।    तब नारद ने ध्यान धर देखा।नारद ने आश्चर्यचकित हो बताया कि  हे बालक ! तुम महान दानी महर्षि दधीचि के पुत्र हो। तुम्हारे पिता की अस्थियों का वज्र बनाकर ही देवताओं ने असुरों पर विजय पायी थी। नारद ने बताया कि तुम्हारे पिता दधीचि की मृत्यु मात्र 31 वर्ष ...

जीवन का लक्ष्य

जीवन का लक्ष्य प्राचीन काल से हिन्दुस्तान, सनातन संस्कृति एवं सभ्यता का केन्द्र बिन्दु रहा है। हिन्दुस्तान धर्म, अध्यात्म, योगा, षिक्षा, संस्कार, एवं मानव मूल्यों के विकास का केन्द्र रहा है। आज दुनिया के शक्तिषाली एवं विकसित देशों में जहॉ विकास चरम पर है, और आगे विज्ञान के क्षेत्र में विकास को कुछ भी नही रह गया है, तब वहॉ की सरकार ने तुलनात्मक अध्ययन मे पाया कि सदियों पहले हिन्दुस्तान इससे भी अधिक विकसित था। जैसे-दुनिया के सबसे तेज चलने वाले विमान की गति से भी तेज उस समय रावण का पुष्पक विमान चलता था, जो मन की गति से चलता था। आज के घातक से घातक मिसाईलों से भी ज्यादा शक्तिषाली एवं घातक तत्कालीन बाण थे। आज के परमाणु बम एवं अणुबम से...