guru poornima

गुरु पूर्णिमा सनातन धर्म की संस्कृति है। डा0 श्री प्रकाश बरनवाल राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रबुद्ध सोसाइटी का कहना है कि परमेश्वर शिव दक्षिणामूर्ति रूप में समस्त ऋषि मुनियों को शिष्य के रूप शिवज्ञान प्रदान किया था। उनका स्मरण करते हुए गुरुपूर्णिमा मनायी जाती है। गुरु पूर्णिमा उन सभी आध्यात्मिक और अकादमिक गुरुजनों को समर्पित परम्परा है जिन्होंने कर्म योग आधारित व्यक्तित्व विकास और प्रबुद्ध करने, बहुत कम अथवा बिना किसी मौद्रिक खर्चे के अपनी बुद्धिमता को साझा करने के लिए तैयार हों। इसको भारत, नेपाल और भूटान में हिन्दू, जैन और बोद्ध धर्म के अनुयायी उत्सव के रूप में मनाते हैं। इस पर्व को हिन्दूबौद्ध और जैन अपने आध्यात्मिक शिक्षकों / अधिनायकों के सम्मान और उन्हें अपनी कृतज्ञता दिखाने के रूप में मनाया जाता है। यह पर्व हिन्दू पंचांग के हिन्दू माह आषाढ़ की पूर्णिमा (जून-जुलाई) मनाया जाता है।[5][6] इस उत्सव को महात्मा गांधी ने अपने आध्यात्मिक गुरु श्रीमद राजचन्द्र को सम्मान देने के लिए पुनर्जीवित किया।[7] ऐसा भी माना जाता है कि व्यास पूर्णिमा श्री वेदव्यास के पुण्य जन्मदिन के रूप में भी यह पर्व मनाया जाता है।[8]

पर्व[संपादित करें]

आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा कहते हैं। इस दिन गुरु पूजा का विधान है। गुरु पूर्णिमा वर्षा ऋतु के आरम्भ में आती है। इस दिन से चार महीने तक परिव्राजक साधु-सन्त एक ही स्थान पर रहकर ज्ञान की गंगा बहाते हैं। ये चार महीने मौसम की दृष्टि से भी सर्वश्रेष्ठ होते हैं। न अधिक गर्मी और न अधिक सर्दी। इसलिए अध्ययन के लिए उपयुक्त माने गए हैं। जैसे सूर्य के ताप से तप्त भूमि को वर्षा से शीतलता एवं फसल पैदा करने की शक्ति मिलती है, वैसे ही गुरु-चरणों में उपस्थित साधकों को ज्ञान, शान्ति, भक्ति और योग शक्ति प्राप्त करने की शक्ति मिलती है।[9]

हिंदू सनातन शास्त्र के अनुसार, इस तिथि पर परमेश्वर शिव ने दक्षिणामूर्ति का रूप धारण किया और ब्रह्मा के चार मानसपुत्रों को वेदों का अंतिम ज्ञान प्रदान किया। इसके अलावा,

यह दिन महाभारत के रचयिता कृष्ण द्वैपायन व्यास का जन्मदिन भी है। वे संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे। उनका एक नाम वेद व्यास भी है। उन्हें आदिगुरु कहा जाता है और उनके सम्मान में गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा नाम से भी जाना जाता है। भक्तिकाल के संत घीसादास का भी जन्म इसी दिन हुआ था वे कबीरदास के शिष्य थे।[10]

शास्त्रों में गु का अर्थ बताया गया है- अंधकार या मूल अज्ञान और रु का का अर्थ किया गया है- उसका निरोधक। गुरु को गुरु इसलिए कहा जाता है कि वह अज्ञान तिमिर का ज्ञानांजन-शलाका से निवारण कर देता है।[11] अर्थात अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले को 'गुरु' कहा जाता है।

  • "अज्ञान तिमिरांधस्य ज्ञानांजन शलाकया, चकच्छू: मिलिटम येन तस्मै श्री गुरुवै नमः "

गुरु तथा देवता में समानता के लिए एक श्लोक में कहा गया है कि जैसी भक्ति की आवश्यकता देवता के लिए है वैसी ही गुरु के लिए भी। [क] बल्कि सद्गुरु की कृपा से ईश्वर का साक्षात्कार भी संभव है। गुरु की कृपा के अभाव में कुछ भी संभव नहीं है। [ख]

आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा कहते हैं। इस दिन गुरु पूजा का विधान है। गुरु पूर्णिमा वर्षा ऋतु के आरम्भ में आती है। इस दिन से चार महीने तक परिव्राजक साधु-सन्त एक ही स्थान पर रहकर ज्ञान की गंगा बहाते हैं। ये चार महीने मौसम की दृष्टि से भी सर्वश्रेष्ठ होते हैं। न अधिक गर्मी और न अधिक सर्दी। इसलिए अध्ययन के लिए उपयुक्त माने गए हैं। जैसे सूर्य के ताप से तप्त भूमि को वर्षा से शीतलता एवं फसल पैदा करने की शक्ति मिलती है, वैसे ही गुरु-चरणों में उपस्थित साधकों को ज्ञान, शान्ति, भक्ति और योग शक्ति प्राप्त करने की शक्ति मिलती है।[12]


गुरु पूर्णिमा 2022 महत्व (Guru Purnima 2022 Significance)
आषाढ़ पूर्णिमा तिथि को महर्षि वेद व्यास जी का जन्म हुआ था और व्यास जयंती को व्यास पूजा करने की परंपरा है. इस दिन को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है. बता दें कि वेद व्यास जी ने महाभारत समेत कई महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की ​थी. भारतीय सभ्यता में गुरु का विशेष स्थान है और कहा जाता है कि माता-पिता के बाद गुरु ही हैं जो कि मुनष्य को सही राह दिखाते हैं. 

ऐसे में गुरुओं के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए गुरु पूर्णिमा सबसे उत्तम दिन है. मानव जाति के प्रति महर्षि वेदव्यास का महत्वपूर्ण योगदान रहा है और इन्होंने ही पहली बार मानव जाति को चारों वेदों- ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद का ज्ञान दिया था. इसलिए उन्हें प्रथम गुरु की उपाधि दी गई है. उनकी विरासत को उनके शिष्यों पैला, वैशम्पायन, जैमिनी और सुमंतु ने आगे बढ़ाया. आषाढ़ पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के रूप में वेद व्यास की जयंती मनाई जाती है.

हिंदू धर्म में गुरु पूर्णिमा पर गुरु की पूजा करने की परंपरा है. शास्त्रों में गुरु को भगवान से ऊपर का दर्जा प्राप्त है. ऐसे में गुरु पूर्णिमा के दिन अपने गुरुओं और बड़ों का आशीर्वाद लेना चाहिए. साथ ही गुरु पूर्णिमा के अवसर पर गुरुओं की पूजा और उनका सम्मान करते हुए उनसे आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए.

प्राचीन काल में गुरु का विशेष महत्व
एक सुशिक्षित समाज के निर्माण के लिए पहले गुरुकुलों में पढ़ाया जाता था जिसमें माता-पिता अपनी संतान को एक निश्चित आयु के बाद भेजा करते थे. गुरुकुल भेजने से पहले एक बच्चे का उसके घर पर ही विद्यारम्भ संस्कार किया जाता था जिसमें उसे अक्षरों, शब्दों इत्यादि का शुरूआती ज्ञान दिया जाता था. इससे वह लिखना व पढ़ना सीख पाता था. यह ज्ञान उसे उसके माता पिता देते थे. इसलिए किसी भी व्यक्ति का पहला गुरु उसके माता पिता ही होते हैं.  

गुरुकुल में भेजने से पहले उपनयन संस्कार किया जाता था. जिसके पश्चात उस व्यक्ति या बालक के जीवन का पूरा आधार गुरु की दी गई शिक्षा पर निर्भर करता था. गुरु के द्वारा ही अपने शिष्यों को सामाजिक, नैतिक, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक मूल्यों के बारे में बताया जाता था. समाज में रहने के लिए क्या आवश्यक है और क्या नहीं, समाज के नियम, क्या सही है व क्या गलत, क्या कर्म करने चाहिए व क्या नहीं, हमारे अधिकार व उत्तरदायित्व क्या हैं. इत्यादि सभी बातें एक शिष्य अपने गुरु से ही सीखता था.  

कुल मिलाकर कहें तो समाज में धर्म की स्थापना करने, उसे मनुष्यों के लिए रहने लायक बनाने, सभी को शिक्षित करने, अराजकता को रोकने, सभी का मार्गदर्शन करने में गुरुओं की ही महत्वपूर्ण भूमिका होती थी. वह एक मनुष्य को समाज में रहने के लिए तैयार करता था. इसलिए गुरुओं के प्रति अपना सम्मान प्रकट करने के लिए ही गुरु पूर्णिमा का पर्व मनाया जाता है.

आम इंसान ही नहीं देवताओं ने भी गुरु से ज्ञान प्राप्त किया है। इसीलिए गुरु का स्थान भगवान से भी ऊपर माना गया है। श्रीराम ने ऋषि वशिष्ठ और विश्वामित्र से ज्ञान प्राप्त किया, श्रीकृष्ण के गुरु सांदीपनि थे। कलियुग में सबसे जल्दी प्रसन्न होने देवताओं में से एक हनुमानजी ने सूर्यदेव को अपना गुरु बनाया था। गुरु पूर्णिमा के अवसर पर जानिए हनुमानजी और सूर्यदेव से जुड़ा प्रसंग, कैसे हनुमानजी ने सूर्य से ज्ञान प्राप्त किया...

  • अजर-अमर रहेंगे हनुमानजी

हनुमानजी भगवान शिव के अवतार माने गए हैं। इनके पिता का नाम केसरी और माता का नाम अंजनी था। माता सीता ने इन्हें अजर-अमर रहने का वरदान दिया है यानी हनुमानजी कभी वृद्ध नहीं होंगे और हमेशा सशरीर इस सृष्टि में रहेंगे। हनुमानजी ने सूर्यदेव से ही वेदों और शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त किया था। सूर्यदेव द्वारा दी गई शिक्षा से ही हनुमान ज्ञानी और भगवान श्रीराम के परम भक्त हुए।

  • हनुमानजी ने ऐसे प्राप्त की शिक्षा

जब हनुमानजी शिक्षा ग्रहण करने के योग्य हुए तो माता-पिता ने उन्हें सूर्यदेव के पास शिक्षा ग्रहण करने के लिए भेजा। हनुमानजी ने जाकर सूर्यदेव से गुरु बनने की प्रार्थना की। तब सूर्यदेव ने कहा कि मैं तो एक क्षण के लिए रुक नहीं सकता और न ही मैं रथ से उतर सकता हूं। ऐसी स्थिति में मैं तुम्हें कैसे शास्त्रों का ज्ञान दे पाऊंगा?

तब हनुमानजी ने कहा कि आप बिना अपनी गति कम किए ही मुझे शास्त्रों का ज्ञान देते जाइए। मैं इसी अवस्था में आपके साथ चलते हुए ज्ञान ग्रहण करूंगा। 

सूर्यदेव इस बात के लिए तैयार हो गए। सूर्यदेव वेद आदि शास्त्रों का रहस्य शीघ्रता से बोलते जाते और हनुमानजी शांत भाव से उसे ग्रहण करते जाते। इस प्रकार सूर्यदेव की कृपा से ही हनुमानजी को ज्ञान की प्राप्ति हुई।

  • पुराने समय में एक आश्रम में गुरु और शिष्य खिलौने बनाते थे। खिलौने बेचकर दोनों का जीवन यापन होता था। गुरु के मार्गदर्शन में शिष्य बहुत अच्छे खिलौने बनाने लगा था और उसके खिलौने ज्यादा कीमत में बिकते थे। फिर भी गुरु उसे रोज ये ही कहते थे कि बेटा और मन लगाकर काम करो। काम में अभी भी पूरी कुशलता नहीं आई है। ये सुनकर शिष्य को लगता था कि गुरुजी के खिलौने मुझसे कम दाम में बिकते हैं, शायद इसीलिए ये मुझसे जलते हैं और ऐसी बातें करते हैं।
  • जब कुछ दिनों तक लगातार गुरु ने उसे अच्छा काम करने की सलाह दी थी तो एक दिन शिष्य को गुस्सा आ गया। शिष्य ने गुरु से कहा कि गुरुजी मैं आपसे अच्छे खिलौने बनाता हूं, मेरे खिलौने ज्यादा कीमत में बिकते हैं, फिर भी आप मुझे ही अच्छे खिलौने बनाने के लिए कहते रहते हैं।
  • गुरु समझ गए कि शिष्य में अहंकार आ गया है, ये क्रोधित हो रहा है। उन्होंने शांत स्वर में कहा कि बेटा जब मैं तुम्हारी उम्र का था, तब मेरे खिलौने भी मेरे गुरु के खिलौनों से ज्यादा दाम में बिकते थे। एक दिन मैंने भी तुम्हारी ही तरह मेरे गुरु से भी यही बातें कही थीं। उस दिन के बाद गुरु ने मुझे सलाह देना बंद कर दिया और मेरी कला का विकास नहीं हो पाया। मैं नहीं चाहता कि तुम्हारे साथ भी वही हो जो मेरे साथ हुआ था।
  • ये बातें सुनकर शिष्य शर्मिंदा हो गया और गुरु से क्षमा मांगी। इसके बाद वह गुरु की हर आज्ञा का पालन करता और धीरे-धीरे उसे अपनी कला की वजह से दूर-दूर तक ख्याति मिलने लगी।

अजय  शर्मा  भाजपा छोडकर कांग्रेस मे गये आज छापा पडा कयो कयोकि इनको अपराध ओर असामाजिक कार्य करने का मौका भाजपा मे नही मिल रहा था 

अमिताभ जी रीवा मे तालाब को स्‍वच्‍छ किये 

लालाराम जी नीलेश कटारे जी वृृक्षारोपण का कार्य कर रहे है 
 
अशोक कुकरेजा जी अभी तक  बिछिया सिक्षोरा 100 रामनगर 100 नकावल 200 छपरा  आश्रम  150 चटुमार 50  छात्रावास टोरिया छोडकर टोरिया मे संगम घाट गोकुल धाम देवगॉव संगम 300 गायंत्री परिवार से वितरण गणेश जी के साथ वितरण किला मंदिर प्रांगण वर्ष 2019 से टोरिया खैरी से लगातार पौधे लगा रहे है  

भ्रष्‍टाचार लाईन मे लगे लोग 

सेवा 

दधीची 

कर्ण 

महाभारत मे 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

PRADHAN MANTRI AWAAS YOJANA-GRAMIN प्रत्‍येक व्‍यक्ति देख सकता है गॉव मे स्‍वीकृत आवास की स्थिति‍

माँ नर्मदा उत्तरवाहिनी परिक्रमा 28 मार्च से 29 मार्च 2026

माँ का सम्मान