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गोंडी कलाकृति को प्रोत्साहित करने जिला प्रशासन ने किया नवाचार

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रेशम की साड़ियों पर पैंटिंग से बढ़ रही आमदनी गोंडी कलाकृति को प्रोत्साहित करने जिला प्रशासन ने किया नवाचार ------------------------- गोंडी कला गोंडवाना काल की प्रसिद्ध चित्र कला है, जो मंडला एवं डिंडोरी ज़िले में गोंड जनजाति द्वारा बनाई जाती है। गोंडी पेंटिंग राज्य प्रशासन द्वारा मंडला ज़िले के लिए एक जिला एक उत्पाद में भी चयनित की गई है। गोंडी कला एवं रेशम को प्रोत्साहित करने की पहली पहल 2020 में कलेक्टर हर्षिका सिंह द्वारा ली गई और रेशम की साड़ियों पर पेंटिंग का नवाचार चालू किया गया। इन साड़ियों की मंडला से बाहर मार्केट में अच्छी प्रतिक्रिया मिली, और रेशम बुनकर एवं गोंडी कलाकारों को आय का स्त्रोत मिला। इसके पश्चात अगस्त 2022 में कलेक्टर हर्षिका सिंह के मार्गदर्शन में ज़िले में पदस्थ महात्मा गाँधी नेशनल फ़ेलो, कृति सिंघई द्वारा नवाचार चालू किया गया, जिसमें व्यापार और पर्यटकों की दृष्टि से गोंडी पेंटिंग से छोटे-छोटे आइटम डिज़ाइन किए गए, जो सस्ते एवं आकर्षक हों। इस नवाचार के अंतर्गत कलाकारों के साथ कार्यशाला आयोजित की गई, ताकि उनके नज़रिये से उनकी दिक्क़तों को समझा जाए और उसके अनुसार कार्ययो...

माँ का सम्मान

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माँ का सम्मान एक मध्यम वर्गीय परिवार के एक लड़के ने 10वीं की परीक्षा में 90% अंक प्राप्त किए ।पिता ने मार्कशीट देखकर खुशी-खुशी अपनी बीवी को कहा कि बना लीजिए मीठा दलिया, स्कूल की परीक्षा में आपके लाड़ले को 90% अंक मिले हैं ..! माँ किचन से दौड़ती हुई आई और बोली, "..मुझे भी बताइये, देखती हूँ...! इसी बीच लड़का फटाक से बोला... "बाबा उसे रिजल्ट कहाँ दिखा रहे हैं ?... क्या वह पढ़-लिख सकती है ? वह अनपढ़ है ...!" अश्रुपुर्ण आँखों को पल्लु से पोंछती हुई माँ दलिया बनाने चली गई । ये बात पिता ने तुरंत सुनी ...! फिर उन्होंने लड़के के कहे हुए वाक्यों में जोड़ा, और कहा... "हां रे ! वो भी सच है...! जब तू गर्भ में था, तो उसे दूध बिल्कुल पसंद नहीं था, उसने तुझे स्वस्थ बनाने के लिए हर दिन नौ महीने तक दूध पिया ... क्योंकि वो अनपढ़ थी ना ...! तुझे सुबह सात बजे स्कूल जाना होता था, इसलिए वह सुबह पांच बजे उठकर तुम्हारा मनपसंद नाश्ता और डिब्बा बनाती थी..... क्योंकि वो अनपढ़ थी ना ...! जब तुम रात को पढ़ते-पढ़ते सो जाते थे, तो वह आकर तुम्हारी कॉपी व किताब बस्ते में भरकर, फिर तुम्हारे शरीर पर ...

झाँसी वाली रानी लक्ष्मीबाई ( Jhanshi Bali Laxmi Bai)

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सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी, बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी, गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी, दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी। चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।। कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी, लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी, नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी, बरछी ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी। वीर शिवाजी की गाथायें उसकी याद ज़बानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।। लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार, देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार, नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार, सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवार। महाराष्टर-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।। हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में, ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी ...

"अविजित पोरस"

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"अविजित पोरस" ई0पु0 315 -21- मकदूनिया में स्त्रियों को कतार बद्ध खड़ा कर दिया गया सौंदर्य - कमयिता के इस प्रदर्शन में *जो सबसे खूबसूरत होगी* उसे यूनान के शासक *सिकंदर* को दिया जायेगा बाकी *सैनिकों को* बाँट दिया जायेगा। पर्शिया कि इस हार ने एशिया के द्वार खोल दिया । भागते पर्शियन शासकों का पीछा करते हुये सिकंदर हिंदुकुश तक पहुँच गया । चरवाहों , गुप्तचरों ने सूचना दी इसके पार एक महान सभ्यता है। धन धान्य से भरपूर सन्यासियों , आचार्यों , गुरूकुलों , योद्धाओं , किसानों से विभूषित सभ्यता जो अभी तक अविजित है। सिकंदर ने जिसके पास अरबी , फ़रिशर्मिंन घोड़ों से सुसज्जित सेना थी ने भारत पर आक्रमण का आदेश दिया , झेलम के तट पर उसने पड़ाव डाल दिया, आधीनता का आदेश दिया। महाराज पोरस कि सभा लगी थी  गुप्तचरों ने सूचना दी आधे विश्व को परास्त कर देने वाला यूनान का सम्राट अलक्क्षेन्द्र ने भारत विजय हेतु सीमा पर पड़ाव डाल दिया है। महामंत्री का प्रस्ताव था - "राजन तक्षशिला के राजा आम्भीक ने अधीनता स्वीकार कर ली है। यह विश्व विजेता है , भारत के सभी महाजनपदों से वार्ता करके ही कोई उचित निर्णय लें...

नाथुराम गोडसे की जन्म तिथि पर वर्षों बाद किसी कवि ने दबे सच को फिर से उजागर करने की कोशिश की है

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      नाथुराम गोडसे की जन्म तिथि पर वर्षों बाद किसी कवि ने दबे सच को फिर से उजागर करने की कोशिश की है आप सभी  साहित्य प्रेमी पाठकों के लिए कवि की मूल कविता नीचे विस्तार से लिखी गयी है !*  Years later, on the date of birth of Nathuram Godse, a poet has tried to uncover the buried truth again, for all you literature lovers, the poet's original poem has been written in detail below! *यह कविता आज सुबह से सोशल मीडिया पर भारी संख्या में शेयर की जा रही हैं !* *माना गांधी ने कष्ट सहे थे,*  *अपनी पूरी निष्ठा से।*               *और भारत प्रख्यात हुआ है,*                    *उनकी अमर प्रतिष्ठा से ॥* *किन्तु अहिंसा सत्य कभी,* *अपनों पर ही ठन जाता है।*                *घी और शहद अमृत हैं पर,*             *मिलकर के विष बन जाता है !!* *अपने सारे निर्णय हम पर,* *थोप रहे थे गांधी जी।*           ...

राष्ट्र भक्ति ले हृदय में हो खड़ा यदि देश सारा

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राष्ट्र भक्ति ले हृदय में हो खड़ा यदि देश सारा  संकटों पर मात कर यह राष्ट्र विजयी हो हमारा।।  क्या कभी किसी ने सुना है सूर्य छिपता तिमिर भय से  क्या कभी सरिता रुकी है बांध से वन पर्वतों से  जो न रुकते मार्ग चलते चीर कर सब संकटों को  वरण करती कीर्ति उनका छोड़ कर सब असुर दल को  ध्येय-मंदिर के पथिक को कण्टकों का ही सहारा।।1।।  हम न रुकने को चलें हैं सूर्य के यदि पुत्र हैं तो  हम न हटने को चलें हैं सरित की यदि प्रेरणा तो  चरण अंगद ने रखा है आ उसे कोई हटाए  दहकता ज्वालामुखी यह आ उसे कोई बुझाए  मृत्यु की पी कर सुधा हम चल पडेंगे ले दुधारा।।2।।  ज्ञान के विज्ञान के भी क्षेत्र  में हम बढ़ चलेंगे।  नील नभ के रूप के नव अर्थ भी हम कर सकेंगे   भोग के वातावरण में त्याग का संदेश देंगे  त्रास के घने बादलों से सौख्य की वर्षा करेंगे  स्वप्न यह साकार करने संगठित हो देश सारा।।3।।

आदिवासी योद्धा पूंजा भील

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आदिवासी योद्धा पूंजा भील जिन्होंने हल्दीघाटी युद्ध किया। जिसके धनुष मात्र से अकबर की सेना में हड़कंप मच जाता था। ऐसे आदिवासी योद्धा को नमन।  राणा पूंजा भील का जन्म मेरपुर में हुआ था। उनके पिता के देहांत होने के पश्चात 15 वर्ष की अल्पायु में उन्हें मेरपुर का मुखिया बना दिया गया। यह उनकी योग्यता की पहली परीक्षा थी, इस परीक्षा में उत्तीर्ण होकर वे जल्दी ही ‘भोमट के भील सरदार’ बन गए। अपनी संगठन शक्ति और जनता के प्रति प्यार-दुलार के चलते वे वीर भील नायक बन गए, उनकी ख्याति संपूर्ण मेवाड़ में फैल गई। अकबर और राणा प्रताप भीलों की सैनिक सहायता प्राप्त करने के लिए भीलों के सरदार पूंजा भील के पास आए क्योंकि (मेरपूर) भोमट क्षेत्र के वन क्षेत्र में भीलों का अधिकार था और भोमट क्षेत्र को पार कर के ही मेवाड़ पहुंचा जा सकता था। राणा प्रताप का एक कारण यह भी था भीलों से सहायता पाने का कि भील गुरिल्ला युद्ध प्रणाली में भील माहीर होते हैं। भीलों के 'कीका' राणा प्रताप  भीलों ने ही राणा प्रताप का पालन पोषण किया था। भील राणा प्रताप को 'कीका' कहा करते थे। इसलिए पूंजा भील ने राणा प्र...