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शाखा है गंगा की धारा, डुबकी नित्य लगाते हैं।

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संघ गीत संघ गीत शा खा है गंगा की धारा, डुबकी नित्य लगाते हैं। शाखा है गंगा की धारा, डुबकी नित्य लगाते हैं। मां का वंदन सांझ-सवेरे, श्रद्धा-सुमन चढ़ाते हैं।। संघ-साधना अर्चन-पूजन, प्रतिदिन शीश झुकाते हैं। भारत मां के भव्य भाल पर भगवा ध्वज लहराते हैं।। संघस्थान मन्दिर सा पावन, मन दर्पण हो जाते हैं।                                            शाखा है गंगा की धारा..1 इसकी रज में खेल खेल कर तन चंदन बन जाते हैं। योग, खेल रवि नमस्कार से स्वस्थ शरीर बनाते हैं।। स्नेह भाव से मिलते-जुलते, मन-मत्सर मर जाते हैं।                                           शाखा है गंगा की धारा...2 लो...

10 नवंबर 1659 यह #शिवप्रताप_दिवस हमारी स्मृतियों में सदा रहना चाहिए क्योंकि ये याद दिलाता है उन धर्मवीर छत्रपति शिवाजी महाराज की...उनकी वीरता की... बुद्धिमता की, कूटनीतिज्ञता की, जिनके बारे में महाकवि भूषण ने लिखा है

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10 नवम्बर / ऐतिहासिक दिवस... क्या इस दरबार में कोई ऐसा है जो उस काफिर शिवाजी को नेस्ताबूद करके इस बीजापुरी सल्तनत को महफूज कर सके बीजापुर के दिवंगत सुलतान की बड़ी बेगम की आवाज भरे दरबार में मौजूद सबके कानों पर पड़ी पर किसी की हिम्मत न हुई कि वो अपने को आग में कूदने को प्रस्तुत कर सके कारण उड़ते उड़ते खबरें सब जागीरदारों, मनसबदारों और सूबेदारों तक पहुँच ही चुकी थी कि 'पहाड़ी चूहा' आग है और जो आग में कूदा वो गया...ऐसे में सामने आया बड़ी बेगम का बहनोई क्रूरता का पर्याय कई युद्धों में बीजापुर को विजय दिला चुका सेनानायक बलिष्ठ पठान अफजल खान खुले दरबार में मुक्तकंठ से आत्मप्रशंसा करते हुए उसने कहा...वह उस कम्बख्त हिन्दू लुटेरे को अपने घोड़े से नीचे उतरे बिना ही पकड़ लेगा उसे 'चूहे' को पिंजरे में बंद करके बीजापुर लाएगा ताकि जनता का मनोरंजन हो सके... बड़ी बेगम की खुशी का ठिकाना ना रहा और दरबार को ऐसा लगा कि बस अब तो उसे 'चूहे' से मुक्ति मिली ही मिली अफजल खान तुरंत अपने मिशन की तैयारियों में लग गया उसके दुर्भाग्य पर चिंतन करते हुए एक मुस्लिम इतिहासकार ने लिखा है... मौत का फरिश्ता...