शाखा है गंगा की धारा, डुबकी नित्य लगाते हैं।


संघ-साधना अर्चन-पूजन, प्रतिदिन शीश झुकाते हैं।
भारत मां के भव्य भाल पर भगवा ध्वज लहराते हैं।।
संघस्थान मन्दिर सा पावन, मन दर्पण हो जाते हैं।
                                           शाखा है गंगा की धारा..1

इसकी रज में खेल खेल कर तन चंदन बन जाते हैं।
योग, खेल रवि नमस्कार से
स्वस्थ शरीर बनाते हैं।।
स्नेह भाव से मिलते-जुलते, मन-मत्सर मर जाते हैं।
                                          शाखा है गंगा की धारा...2

लोक संगठन के संवाहक, गटनायक बन जाते हैं।
कुम्भकार की रचना करके, गणशिक्षक कहलाते हैं।।
देशभक्ति का गीत हृदय में, मातृभक्ति पनपाते हैं।
                                         शाखा है गंगा की धारा....3

मधुकर की यह तपः साधना वज्र शक्ति बन जायेगी।
मां बैठगी सिंहासन पर, यश-वैभव को पायेगी।। 
केशव-माधव का यह दर्शन, मोह जाल कट जाते हैं।
                                          शाखा है गंगा की धारा..4


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