10 नवंबर 1659 यह #शिवप्रताप_दिवस हमारी स्मृतियों में सदा रहना चाहिए क्योंकि ये याद दिलाता है उन धर्मवीर छत्रपति शिवाजी महाराज की...उनकी वीरता की... बुद्धिमता की, कूटनीतिज्ञता की, जिनके बारे में महाकवि भूषण ने लिखा है
10 नवम्बर / ऐतिहासिक दिवस...
क्या इस दरबार में कोई ऐसा है जो उस काफिर शिवाजी को नेस्ताबूद करके इस बीजापुरी सल्तनत को महफूज कर सके बीजापुर के दिवंगत सुलतान की बड़ी बेगम की आवाज भरे दरबार में मौजूद सबके कानों पर पड़ी पर किसी की हिम्मत न हुई कि वो अपने को आग में कूदने को प्रस्तुत कर सके कारण उड़ते उड़ते खबरें सब जागीरदारों, मनसबदारों और सूबेदारों तक पहुँच ही चुकी थी कि 'पहाड़ी चूहा' आग है और जो आग में कूदा वो गया...ऐसे में सामने आया बड़ी बेगम का बहनोई क्रूरता का पर्याय कई युद्धों में बीजापुर को विजय दिला चुका सेनानायक बलिष्ठ पठान अफजल खान खुले दरबार में मुक्तकंठ से आत्मप्रशंसा करते हुए उसने कहा...वह उस कम्बख्त हिन्दू लुटेरे को अपने घोड़े से नीचे उतरे बिना ही पकड़ लेगा उसे 'चूहे' को पिंजरे में बंद करके बीजापुर लाएगा ताकि जनता का मनोरंजन हो सके...
बड़ी बेगम की खुशी का ठिकाना ना रहा और दरबार को ऐसा लगा कि बस अब तो उसे 'चूहे' से मुक्ति मिली ही मिली अफजल खान तुरंत अपने मिशन की तैयारियों में लग गया उसके दुर्भाग्य पर चिंतन करते हुए एक मुस्लिम इतिहासकार ने लिखा है...
मौत का फरिश्ता उसकी गर्दन पकड़ उसे बर्बादी की तरफ ले चला... मराठा जनश्रुतियों के अनुसार उसके साथ इतने अपशकुन हुए इतनी अजीब अजीब बातें हुईं कि स्वयं अफजल खान भी भयभीत हो गया और उसे अपने सही-सलामत वापस लौटने पर संदेह होने लगा...
ऐसे में ये सोचकर कि उसके बाद उसके हरम की औरतें किसी दूसरे पुरुष के साथ जाएँ उसने आदेश निकाला कि हरम की सभी चौंसठ औरतों को जल में डुबाकर मार दिया जाए 63 ने मौन रहकर मरना ही उचित समझा पर एक ने भागने की चेष्टा की उसे तलवार से काट डाला गया आज भी बीजापुर में ये कब्रें बनी हैं 63 एक साथ और 64वीं कुछ दूरी पर जो उस नरपिशाच की क्रूरता की कहानी कह रही हैं...
फिर अफजल खान निकला छत्रपति शिवजी महाराज को पकड़ने के लिए और उसने वो सारे कुकृत्य करने शुरू कर दिए जो हिन्दू प्रदेशों में करना मुस्लिम बादशाहों का शगल रहा था मंदिर तोड़े जाने लगे, मूर्तियां पददलित की जाने लगीं, गौवंश का वध कर उसे रक्त को गृभगृहों में छिड़का जाने लगा, हिन्दुओं का नृशंस कत्ल ए आम होने लगा, हिन्दू ललनाओं का शील भंग किया जाने लगा...
छत्रपति शिवाजी महाराज तक सब समाचार पहुँच रहे थे परन्तु वे ये भी समझ रहे थे कि यदि उत्तेजित हो वो खुले मैदान दो दो हाथ करने पहुँच गए तो मराठों को काल के गाल से कोई नहीं बचा पायेगा क्योंकि ना तो बड़ी सेना है न अनुभवी सेनापति ना खुले में युद्ध का अनुभव है और न किसी अन्य शक्ति से सहायता की आशा ऐसे में अप्रत्याशित रूप से अफजल खान का संधि का संदेश आ पहुँचा जो अत्यंत सहज शर्तों पर संधि के लिए तैयार था...महाराज को अत्यंत विस्मय हुआ और वास्तविक मंतव्य जानने के लिए उन्होंने अफजल खान के दूतों में से एक ब्राह्मण दूत को देश-धर्म पर अफजल खान द्वारा किये गए अत्याचारों को याद कराते हुए उसे भावुक कर ये भेद जान लिया कि संधि तो बहाना है मकसद शिवाजी को बुलाकर निपटाना है...
फिर छत्रपति ने कूटनीति का वो दाँव खेला जिसकी इतिहास में सानी मिलना मुश्किल है अफजल खान जैसे क्रूर सयाने और घाघ सेनानायक को वो ये विश्वास दिलवाने में सफल रहे कि उसके डर से शिवाजी की हालत पस्त है वो काँप रहे हैं और किसी भी कीमत पर उसके चरणों में गिरने को तैयार हैं पर उनमें इतना भी साहस नहीं कि अफजल खान के पास आकर उससे मिल सकें और इसलिए यही अच्छा रहेगा कि किसी एकांत जगह पर दोनों लोग अकेले मिलें ताकि अफजल खान की शानशौकत और रुतबे से शिवाजी घबरा ना जाएँ
अफजल खान तैयार हो गया और फिर महाराज द्वारा पहले से सोचे एक ऐसे स्थान पर मिलने का कार्यक्रम तय हो गया जिसके चप्पे चप्पे से मराठे वाकिफ थे और बीजापुरी सेना को जिसका इतिहास-भूगोल कुछ नहीं पता था...
नियत तिथि को शिवाजी ने अंगरखे के नीचे लौहकवच धारण किया बिच्छू की आकृति की एक कृपाण खोंस ली और बाएं हाथ में एक "बाघनख" छिपा लिया और चल पड़े अफजल खान से मिलने
प्रतापगढ़ दुर्ग के नीचे के एक वनों से घिरे पर्वत शिखर पर यह मुलाकात होनी थी...
शिवाजी जब मिलने के लिए तम्बू में पहुंचे अफजल खान ने बाहें फैलाकर उन्हें गले से लगने का न्योता दिया पर ये क्या...अफजल से लगभग एक हाथ छोटे शिवाजी जैसे ही उसके आलिंगन में आबद्ध हुए खान ने अपने एक हाथ से शिवाजी की गर्दन को पकड़ लिया इस पहलवानी पकड़ से अपनी गर्दन छुटाने और बचने का शिवाजी ने हर प्रयास किया पर असफल रहे और भूमि से ऊपर उठाये जाने लगे...
तब शिवाजी अपना दाहिना हाथ किसी तरह मुक्त करा बाएं हाथ का बाघनख अफजल खान की पीठ में गहरे पैबस्त कर दिया और कमर से कृपाण निकाल उसके पार्श्व में घुसेड़ दिया इस अकस्मात हमले से वो क्रूरकर्मा हतप्रभ रह गया और चीखते हुए लड़खड़ाकर पीछे हटा उसके अंगरक्षक दौड़े आये और उसे निकाल ले जाने का प्रयास करने लगे पर शिवाजी के अंगरक्षकों के हाथों मारे गए और फिर एक मराठे से अफजल खान का भी सर काट विजयघोष के साथ ऊपर उठा दिया...रणसिंगे बज उठे और यहाँ वहां छिपे मराठे बीजापुरी सेना पर काल बन टूट पड़े इस अप्रत्याशित हमले से बेखबर बीजापुरी सेना को सँभलने का भी मौका ना मिला कितने ही मारे गए और फिर जिसे जहां से मौका मिला भाग निकला बीजापुर समाचार पहुंचा तो वहां मातम छा गया और उनके सपनों में भी वो 'पहाड़ी चूहा' उन्हें आकर डराने लगा अफजल खान का वध कर बीजापुर सहित सभी विधर्मियों को मराठों की शक्ति से परिचित कराने वाला...
वो दिन था 10 नवंबर 1659 यह #शिवप्रताप_दिवस हमारी स्मृतियों में सदा रहना चाहिए क्योंकि ये याद दिलाता है उन धर्मवीर छत्रपति शिवाजी महाराज की...उनकी वीरता की... बुद्धिमता की, कूटनीतिज्ञता की, जिनके बारे में महाकवि भूषण ने लिखा है...
इंद्र जिमि जंभ पर, बाड़व सु अंभ पर,
रावन सदंभ पर रघुकुल राज हैं।
पौन वारिवाह पर, संभु रतिनाह पर,
ज्यों सहस्रबाहु पर राम द्विजराज हैं
दावा द्रुमदंड पर, चीता मृगझुंड पर,
भूषण वितुंड पर जैसे मृगराज हैं।
तेज तम अंस पर, कान्ह जिमि कंस पर,
त्यों मलेच्छ बंस पर शेर शिवराज हैं...

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